शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

ख़ुशख़बरी ! प्रेमी-प्रेमिकाओं के लिए ख़ुशख़बरी



ख़ुशख़बरी ! …. ख़ुशख़बरी ! ….ख़ुशख़बरी ! ….प्रेमी-प्रेमिकाओं के लिए ख़ुशख़बरी ! ….इस बार वेलेंटाइन डे पर उन्हें कोई नहीं रोकेगा.... कोई उन्हें गार्डन में एक-दूसरे से मिलने पर नहीं टोकेगा...कोई उन्हें एक-दूसरे को फूल देने पर नहीं पिटेगा....रेस्टोरेंट में साथ खाना खाने पर नहीं पकड़ेगा और ना ही पब में साथ डांस करने पर जबरदस्ती शादी करा देगा....क्योंकि सेना (शिवसेना) इस बार दूसरे कामों में व्यस्त है ...जी हां वही किंग ख़ान की फिल्म माई नेम इज़ खान के ख़िलाफ़ धमा-चौकड़ी मचाने में....बहुत दिन से सुन रहा हूं....शिवसेना ने वहां पोस्टर जला दिया.. उसका बैनर फाड़ दिया...वहां उत्पात मचा दिया। सुनकर बूरा भी लगा और अच्छा भी.... !!! बूरा इसलिए कि, देखो अपने देश में क्या कुछ हो रहा है... और अच्छा इसलिए कि.... चलो ठीक है … इसी बहाने सेना को कुछ काम तो मिला...!!!!! पिछले कुछ सालों से ठाकरे की ये सेना तो बिल्कुल निकम्मी ही हो गई थी...ना तो हथियार में धार बचे थे... और ना ही जुबान पर आक्रमकता ....अच्छा हुआ..!!!!! कुछ दिनों के लिए ही सही....इन कागजी शेरों को दहाड़ने का (नारेबाज़ी) का मौका तो मिला। नहीं तो, पूरे साल में ये, सिर्फ एक ही दिन तो काम करते हैं...और वो भी 14 फरवरी यानि वेलेंटाइन डे को....इधर-उधर गार्डंस में घूमकर प्रेमी-प्रेमिकाओं को पकड़ना...रेस्टोरेंट जाकर सुकून से बैठे प्रेमी जोड़ों को मारना-पिटना...जबरदस्ती शादी कराना ... यही तो इनका काम बचा था। वो तो शुक्र हो, शाहरुख़ खान और IPL का...जिन्होंने ठाकरे के सैनिकों को 14 फरवरी के पहले दूसरे काम में फंसा दिया और इन्हे उनके मेन मोटो ( वेलेंटाइन डे ) के पहले ही थका दिया।... सोचिए !!!! अगर शाहरुख ने आईपीएल को लेकर बयान नहीं दिया होता...तो क्या होता ???? वही होता, जो हर साल होता है, यानि सिर्फ एक दिन और वो भी तीन-चार घंटे के लिए सेना बाहर निकलती....दो-तीन घंटे तक हाथ में भगवा झंडा लेकर इधर-उधर धमा-चौकड़ी मचाती ... वेलेंटाइन डे हाय-हाय के नारे लगाती... प्रेमी-प्रेमिकाओं को पकड़ती...मारती-पिटती और जबरदस्ती शादी कराती। चलो, इस बार कम से कम प्रेमी-प्रेमिका सुकून प्रेम का इजहार तो कर सकेंगे। अब पता नहीं ये प्रेमी-प्रेमिका किसका थैक्स करें ? बाल ठाकरे का (जिन्होंने शाहरुख के खिलाफ अपनी सेना को लगाकर उन्हें वेलेंटाइन के पहले थका दिया) या फिर शाहरुख खान का (जिन्होंने आईपीएल में पाकिस्तानी प्रेम का इज़हार किया) ! खैर जो भी हो हम तो बस यही कहेंगे... good luck $ Cherr!!!!!! Up

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

मुंबई बाल ठाकरे की बपौती है क्या ?


सब जानते हैं कि बाल ठाकरे जो कर रहे हैं वो ग़लत है...सबको पता है कि बाल ठाकरे का बयान संविधान के खिलाफ़ है..तोड़फोड़..भड़काऊ बयान...और सरेआम गुंडागर्दी आपसी सौहार्द को बिगाड़ रही है... लेकिन फिर भी सरकार क्यों बार-बार ठाकरे परिवार के सामने सरेंडर कर रही है समझ में नहीं आ रहा...? क्यों बार-बार हम गिड़गिड़ा रहे हैं और वो हमें ठेंगा दिखा रहे हैं। क्या हमारी सरकार पूरी तरह से नपूंसक हो गई है ? क्यों ठाकरे परिवार के गिरेबान तक पहुंचने से पहले कानून के हाथ कांपने लगते हैं। कानून में कमी है या फिर केंद्र-महाराष्ट्र सरकार की इच्छाशक्ति में । क्यों नहीं बाल ठाकरे और राज ठाकरे जैसे नेता सलाखों के पीछे दिख रहे हैं। अभी कल की ही बात है कि शरद पवार बाल ठाकरे के निवास स्थान मातोश्री पहुंचे और उनसे अपना गुस्सा शांत रखने का अनुरोध किया। ठाकरे के सामने हमारे केंद्रीय मंत्री शरद पवार ने गिड़गिड़ाया....कहा कि आप ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को मुंबई में खेलने दें..... और बाल ठाकरे ने मालिक की तरह, कहा... ठीक है देख लेंगे। ऐसा लगा मानों मुंबई देश की नहीं बाल ठाकरे की बपौती हो । ना तो बाल ठाकरे के पास गिड़गिड़ाने में शरद पवार को शर्म आई...और ना ही बाल ठाकरे को कुछ बोलते हुए लाज आई...ऐसा लगा मानों मुंबई में देश का संविधान नहीं.. बाल ठाकरे का संविधान चलता हो। मतलब बाल ठाकरे ने जो कह दिया.. वही सही है..बाकि सब ग़लत। कुछ दिन पहले तक ठाकरे पाकिस्तानी खिलाड़ियों के पीछे पड़े थे और अब ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों के पीछे पड़े हैं। ठाकरे कहते हैं कि ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हमला हो रहा है तो फिर हम उस देश के खिलाड़ी को, कैसे अपने देश में खेलने दें। ठाकरे जिस तरह का बयान दे रहे हैं...उसे देखकर तो यही लगता है मानों पूरी दुनिया-जहान का उन्होंने ही ठेका ले रखा है। कौन कहां खेलेगा...कौन किसे अपनी टीम में लेगा....और कौन किसके ख़िलाफ़ क्या बोलेगा.. सब ठाकरे के ही हुक्म से बोलेगा और चलेगा। ना तो बाल ठाकरे को अपनी उम्र का लिहाज है और ना ही देश की अखंडता का अहसास...कितनी शर्म की बात है कि देश का केंद्रीय मंत्री आज एक अदने से नेता..जिसकी खुद की ना तो कोई औकात है..और राष्ट्रीय राजनीति में कोई पकड़ ... उसके पास जाकर हाथ फैला रहा है.... अनुरोध कर रहा है... कह रहा है भाई... हम पर रहम करो ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ियों को मुंबई में खेलने दो। शरद पवार साहब आपकी सत्ता है...आपके पास ताकत है..केंद्र में आपकी सरकार है और महाराष्ट्र में भी आपका ही हुक्म चलता है, तो फिर क्या जरूरत पड़ गई जो बाल ठाकरे जैसे नेता के पास गिड़गिड़ाने की....उत्पाती शिवसैनिक को पकड़िए...जमकर धुनिए और जेल में डालिए...देखिए फिर कैसे इन शिवसैनिकों की सिट्टी-पिट्टी गुम होती है। एक दिन चिल्लाएंगे-दो दिन चिल्लाएंगे ... तीसरे दिन कोई शिवसैनिक घर से नहीं निकलेगा.... पवार साहब.! कानून हमारे देश का बहुत बड़ा है और डंडे में बहुत ताकत है....हां, बस इस्तेमाल करना आना चाहिए। हमें पता है जो हम बोल रहे हैं ...उससे ना तो बाल ठाकरे को कोई फर्क पड़ेगा और ना ही शरद पवार को। क्योंकि सब राजनीति है...और राजनीति के आगे बड़े से बड़ा नेता भी नामर्द बन जाता है।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

आखिर सिंगल में कब मिलेगा ग्रैंड स्लेम ?


रविवार दोपहर से ही लिएंडर पेस मीडिया की सुर्खियों में थे। करीब एक घंटे तक ब्रेकिंग न्यूज चलने के बाद..स्पेशल स्टोरी और आधे घंटे तक का स्पेशल प्रोगाम चलाने का जो दौर शुरू हुआ, जो देर रात ही नहीं, सोमवार दोपहर तक जारी रहा। वजह ऑस्ट्रेलियन ओपन में पेस का मिक्सड डबल्स का खिताब जीतना । बेशक लिएंडर पेस ने जो किया वो देश के लिए गौरव की बात है, हम भी उनके कायल हैं और उनके प्रदर्शन का लोहा मानते हैं, उनकी कामयाबी को देख हमारा सीना भी चौड़ा हो जाता है। लेकिन आपको लगता नहीं ....? कि सवा अरब जनसंख्या वाले देश में सिर्फ एक ग्रैंड स्लेम और वो भी सिंगल में नहीं मिक्सड डबल्स में... महज एक सांत्वना सरीखा ही है। देश में ऐसे कहने को तो, कई दमदार युवा खिलाड़ी हैं.. और शानदार अनुभवी खिलाड़ी भी.... तो फिर उन खिलाड़ियों में एक भी सिंगल ग्रैंड स्लेम जीतने का माद्दा क्यों नहीं है ? आखिर ग्रैंड स्लेम के सिंगल मुकाबले में उनका दम क्यों नहीं दिखता....क्यों हमारी कामयाबी सिर्फ डबल्स और मिक्सड डबल्स तक ही सिमटी रह जाती है ? क्यों नहीं हम सिंगल में क्वार्टर फाइनल तक भी पहुंच पाते ? कहते हैं आप आदर्श बनिए! दुनिया आपके पदचिन्हों पर चलने के लिए तैयार है। आज टेनिस की दुनिया में रोजर फेडरर, जस्टिन हेनिन जैसे आदर्श मौजूद हैं, तो फिर हमारे खिलाड़ी, उन आदर्श के पदचिन्हों पर क्यों नहीं चलते ? क्यों नहीं हमारे देश में भी फेडरर .. नाडाल....एंडी मर्रे और डोकोविच जैसे खिलाड़ी पैदा होते हैं ? क्यों सवा अरब लोगों की जनसंख्या वाले देश में अभी तक एक ऐसा सूरमा पैदा नहीं हुआ ... ? जो सीना ठोककर ये कह सके कि मैं जीतूंगा देश के लिए सिंगल में ग्रैंड स्लेम! आखिर कब तक हमारा देश सिर्फ लिएंडर पेस और महेश भूपति की ही कामयाबी पर गर्व करता रहेगा.. क्या हमारी निगाहों को नया लिएंडर पेस...अलग महेश भूपति और दूसरी सानिया मिर्जा के दीदार के लिए अभी और इंतजार करना होगा। 11वां ग्रैंड स्लेम जीतकर महेश भूपति की बराबरी करने वाले लिएंडर पेस ने कहा कि वो फेडरर के नक्शे कदम पर चलना चाहते हैं..लेकिन मेरा सवाल लिएंडर से ये है कि सिर्फ वो नक्शे कदम पर चलना चाहते हैं या फिर चलेंगे भी...क्या हम सिर्फ क्रिकेट में ही नंबर वन बनेंगे, क्या हमारे देश का कोई खिलाड़ी कभी दुनिया का नंबर एक खिलाड़ी नहीं बनेगा। क्या हमारे देश के खेलप्रेमी सिर्फ फेडरर और नाडाल की जीत पर ही ताली बजाते रह जाएंगे....या फिर हम अपने देश के खिलाड़ी पर कभी इतराएंगे ?

रविवार, 31 जनवरी 2010

हंगामा इसलिए है बरपा...


इस बार क्रिकेट के बाजार में पाकिस्तानी माल नहीं बिका। माल चोखा भी था और ताजा भी...ऐसे में उम्मीद तो यही थी कि ये माल सभी को लुभाएगा..और लुभाएगा ही क्यों ? सबसे ज्यादा दाम में भी बिकेगा, लेकिन वक्त का सितम देखिए...जिसकी कीमत सबसे ज्यादा लगनी चाहिए थी..उसे खरीदने की बात तो दूर मोलभाव भी करने वाला कोई खड़ा नहीं हुआ.. नतीजा पाक का ताजा माल आईपीएल पार्ट थ्री के लिए बासी हो गया। ऐसा नहीं था कि सिर्फ पाकिस्तानी माल ही आईपीएल की मंडी में पड़ा रहा..बल्कि क्रिकेट की मंडी में पहुंचे दुनिया भर के सौ से ज्यादा खिलाड़ी इस बार बिक नहीं सके...लेकिन नहीं बिकने वालों में सबसे ज्यादा बवेला मचाया पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने.. किसी ने कहा उनका अपमान हुआ.. तो किसी ने कहा धोखा .. किसी ने मोदी को कोसा.. तो किसी ने विदेश मंत्रालय को जिम्मेदार बताया। पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने आईपीएल में खेलने को लेकर भारत के खेल बिरादरी से लेकर सियासी गलियारे तक हल्ला मचाया, उसे देखकर तो यही लगा कि ये पाकिस्तानी खिलाड़ियों का क्रिकेट प्रेम है, लेकिन वास्तविकता में ये क्रिकेट प्रेम नहीं .. पैसा प्रेम है। दरअसल पाकिस्तानी खिलाड़ियों को आईपीएल में खरीदा जाता तो उन्हे इतना पैसा मिल जाता जितना कई सालों तक अपने देश की तरफ खेलने के बाद भी नहीं मिल पाता। पीसीबी अपने क्रिकेटरों को तीन ग्रेडों में बांटकर पगार देता है। ‘ A ’ ग्रेड के खिलाड़ियों को प्रति माह ढाई लाख रुपए..‘ B ’ ग्रेड के खिलाड़ियों को एक लाख 75 हजार रुपये और ‘ C’ ग्रेड में शामिल पाकिस्तानी खिलाड़ियों को एक लाख 25 हजार रुपये मिलता है। यानि कोई पाकिस्तानी खिलाड़ी ग्रेड A में भी हो तो साल भर में वो 30 लाख से ज्यादा कमा नहीं पाता होगा, लेकिन अगर उन्हे आईपीएल में खेलने का मौका मिलता है तो डेढ़ महीने में ही उनकी कमाई साढ़े तीन करोड़ रुपये तक हो जाती। तो समझे ना !!! पाकिस्तानी खिलाड़ियों के लिए हंगामा यूं ही नहीं बरपाया..हंगामा इसलिए हैं बरपाया..!!!

रविवार, 3 जनवरी 2010

BCCI : चोरी भी, सिनाजोरी भी !



बचपन से सुनता आया हूं... ग़लतियों को कभी मत छुपाओ...बुराई को कभी बढ़ावा मत दो...अगर तुम वास्तव में किसी के शुभचिंतक हो तो फिर उसके सबसे बड़े आलोचक बनो....घर में मम्मी-पापा से सुना ...स्कूल में शिक्षक ने बताया...लेकिन भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के जितने भी अधिकारी हैं..वो लगता है ऐसे बुनियादी शिक्षा से महरुम है...ऐसे तो कई बार बीसीसीआई की दिमागी संतुलन पर सवाल उठे हैं...लेकिन इस बार जो नया वाकया कोटला विवाद पर बयान के रूप में सामने आया है, उससे तो ये बात पूरी तरह साबित हो गई ...कि सच में बीसीसीआई का उपरी तल्ला खाली हो चुका है। 27 दिसंबर 2009 को कोटला पर कैसा कोहराम हुआ, ये हमने भी देखा और आपने भी देखा होगा...कोटला की पिच किस कदर खराब थी ये बताने की जरूरत नहीं... पूरी दुनिया ने देखा कि 23 ओवर के खेल में किस तरह गेंद ज़मीन चूमकर हवा लहराई.. कितनी बार गेंद जयसूर्या के सर से पार गई... किस तरह सुदीप की गेंद पर दिलशान बल्ला छोड़ औंधे मुंह गिर पड़े... किस तरह गेंद की मार से जयसूर्या तिलमिला गए...लेकिन लग रहा है जब ये सारा वाकया हो रहा था तो बीसीसीआई के अधिकारियों के घरों से बिजली गायब थी...तभी तो जो कुछ घटा वो बीसीसीआई ने नहीं देखा.... या यूं कहें कि जब कोटला पर मैच चल रहा था...उस वक्त बीसीसीआई के अधिकारी आंख-मिचौली खेल रहे थे...और किसी एक की आंख पर नहीं बीसीसीआई के सारे अधिकारी की आंख पर पट्टी बांध दी गई थी... खराब पिच जो कुछ होना था वो तो हो गया...नियम के मुताबिक बीसीसीआई से आईसीसी ने जवाब तलब किया ....कि किस परिस्थिति में नई नवेली पिच पर अंतरराष्ट्रीय मैच करा दिए गए...क्यों मुकाबले के पहले पिच को जांचा परखा नहीं गया........पता है ? इस सारे का सवाल का जो जवाब Bcci ने तैयार किया वो क्या है । बीसीसीआई ने कहा है पिच बिल्कुल भी खराब नहीं थी....अगर खराब होती तो क्या 23 ओवर के खेल में सिर्फ सात बार ही गेंदें खतरनाक तरीके से उठती ? मतलब अपना जवाब नहीं देकर बीसीसीआई ने खुद आईसीसी से ही सवाल पूछ डाले। साफ है कि बीसीसीआई तभी पिच को खतरनाक मानता जब 23 ओवर के खेल में करीब 100 से ज्यादा गेंदें खतरनाक तरीके से उठती और उस गेंद से एक- दो नहीं, लंका के सभी खिलाड़ी घायल हो जाते। चोरी और सिनाजोरी तो देखिए ! बीसीसीआई ने यहां तक कहा डाला है कि जब उनकी टीम न्यूज़ीलैंड में खतरनाक पिच पर खेली थी, तो उस वक्त आईसीसी क्यों खामोश रहा। अरे भाई साहब ! अपनी गलतियां देखिए ना.... दूसरों की ग़लतियों को क्यों गिना रहे हैं। बीसीसीआई ने कोटला की पिच के बारे में जितनी भी दलील दी है मेरे-आपके क्या पूरी दुनिया के पल्ले से बाहर है.। डीडीसीए को बचाने और खुद की ग़लतियों को छुपाने के लिए बीसीसीआई जो कुछ दलील दे रही है ...मैं तो उससे इक्तेफाक नहीं रखता...क्या आप इक्तेफाक रखते हैं। हमें जरूर बताइएगा...नहीं तो बीसीसीआई की तरह ग़लतियों को बढ़ावा देने वालों में शामिल हो जाएंगे।

गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

सिडनी में जय हो !


जय हो ... स्लमडॉग मिलियनियर का गाना आपने तो सुना ही होगा...मैंने भी सुना है..लेकिन जहां मैंने सुना..वहां आपने नहीं सुना होगा...और सच कहूं आप वहां सुनने की उम्मीद कभी कर भी नहीं सकते हैं। मैंने जय हो को गूंजते सुना सिडनी हार्बर ब्रिज पर। जी हां वही सिडनी...जो हमसे-आपसे लाखों मील तो दूर है हीं...हमारी भाषा, संस्कृति और रीति रिवाज से भी उनका कोई सरोकार नहीं है..लेकिन ऑस्ट्रेलिया की राजधानी सिडनी में जय हो गूंजा और खूब गूंजा....मौका-ए-जश्न था, नए साल के स्वागत समारोह का। भारत में 31 दिसंबर को शाम के तकरीबन साढे छह बजे थे...लेकिन ऑस्ट्रेलिया में रात गहरा चुकी थी... नए साल के जश्न की शुरुआत हो चुकी थी। मेरी तरह आप भी ये सुनकर आश्चर्यचकित हो जाएंगे कि नये साल के जश्न में सिडनी के हार्बर ब्रिज में जो सार्वजनिक समारोह चल रहा था उसमें सबसे पहला गाना बजा 'जय हो'. सुनकर आश्चर्य भी हुआ...और गर्व भी। आश्चर्य इस बात का कि हिंदी भाषा का जिस देश में दूर-दूर तक वास्ता नहीं हो..वहां सार्वजनिक समारोह में जय हो का गाना गूंज रहा है... और गर्व इस बात कि भारत का प्रभुत्व अब सात समंदर लांघ ऑस्ट्रेलिया भी पहुंच गया है। मैंने सुना भी है और महसूस भी किया है.... कि गाने के बोल हकीकत से ज्यादा काल्पनिक होते हैं...लेकिन जय हो में जो बोल हैं वो काल्पनिक से ज्यादा हकीकत दिख रहे हैं ... जय हो में एक बोल है 'आजा-आजा हिंद शामियाने के तले, आजा जरीवाले नीले आसमान के तले' और सच आज पूरा जमाना धीरे-धीरे हिंद शामियाने के तले आता जा रहा है । जो काम हमारे राजनेता..हमारी सेना ने नहीं किया...वो काम कर दिखाया एक संगीत ने। ऑस्ट्रेलिया में जय हो के बाद अब हर देशवासी को इंतजार है .... अमेरिका..रुस...और चीन जैसे देशों में भी जय हो के गूंजने की। सच संगीत में खूब शक्ति होती है...हमें फक्र है ए.आर. रहमान के म्यूजिक पर...गुलजार की कलम पर...जि्न्होंने हाथों की अंगुली से और कलम की मजबूती से पूरी दुनिया में हिंदुस्तान को पहचान दिलाई।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

तुमको ना भूल पाएंगे !




श्रद्धांजलि....ये शब्द अपने से कई गुना ज्यादा बड़े मायने को खुद में सहेजे हुए हैं। श्रद्धांजलि यानि उस शख्सियत से जुड़ी आपकी यादें...आपका समपर्ण...और उस शख्सियत के प्रति आपकी भावनाएं। आज मैं एक ऐसी ही शख्सियत को सलाम कर रहा हूं...जिन्हे मैं ज्यादा जानता तो नहीं था, लेकिन उनका कायल जरूर था। अशोक उपाध्याय...ये नाम मीडिया जगत में ज्यादा मशहूर तो नहीं, लेकिन Etv से जुड़े हरेक शख्स के लिए इस नाम से बड़ा नाम कोई और नहीं हो सकता। 25 दिसंबर 2009 ... शुक्रवार का दिन था और हर दिन की तरह करीब साढे दस बजे मैं दफ्तर पहुंचा। आते ही मेरे एक पुराने अजीज मित्र मुझे मिल गए। अमूमन वो आते ही मेरे बारे में कमेंट किया करता था, लेकिन आज उसके भाव बदले हुए थे, मैंने उसे नजरअंदाज कर एडिटिंग टेबल की तरफ बढ़ा, तो वो तेजी से मेरी तरफ लपके, उसे देख मैंने यही सोचा कि शायद फिर वो मजा करने के मूड में है। पहले तो वो कुछ देर खड़े रहे फिर सवालिया लहजे में पूछा " अरे पता चला अशोक उपाध्याय की डेथ हो गई" पहले तो लगा आज फिर वो मुझे गच्चा दे रहा है...लेकिन
अशोक उपाध्याय की शख्सियत ऐसी है, जिनके बारे में मजाक करे और वो उनकी मौत के बारे में .. विश्वास नहीं हुआ। इसलिए दोबारा पूछा ..लेकिन इतना ही पूछ पाया, क्या सच में... उसने मुझे एक मैसेज दिखाया। फिर क्या था...जुबान खुली रह गई, हाथ में हेडफोन पकड़ा रह गया और ना जाने मैं कहां हो गया। पुरानी यादें निगाहों में तैरने लगी, जब ईटीवी में आया तब की..जब उन्हे घर पर बैठकर टीवी में देखा करता था तब की...विश्वास ही नहीं हो रहा था...। और मैं क्या ? मेरी तरह कई ऐसे लोग थे जिन्हे इस बात यकीन नहीं था कि सुंदर काया के मालिक और बेजोड़ आवाज के स्वामी अशोक उपाध्याय अब हमारे बीच नहीं हैं। अशोक उपाध्याय को ऐसे तो कई बार टीवी पर देखा, लेकिन पहली बार अपनी निगाहों से देखा 7 अगस्त 2006 को। मुझे ईटीवी में आए हुए करीब नौ दिन हो चुके थे और मेरे सामने ही उनकी डेस्क (राजस्थान डेस्क) थी। जैसा सोचा था, वैसा ही पाया अशोक उपाध्याय को। सच कहूं मैंने पांच साल के अपने पत्रकारिता के करियर उनके जैसा खुबसूरत व्यक्तित्व नहीं देखा। दिखने में जितने खुबसूरत, व्यवहार और दिल के उतने ही सच्चे और साफ। क्रिकेट उनका पसंदीदा खेल था और मैच के बारे में वो अक्सर टिप्पणी करते-करते मेरे स्पोर्ट्स डेस्क तक चले आते थे। कभी-कभी मैं उनसे वीओ कराने जाता था, अधिकांश मौकों पर तो उन्होंने निराश नहीं किया..अगर कभी इनकार भी किया तो इतने प्यार से ..कि कभी बुरा लगा ही नहीं...बाद वो ईटीवी में नेशनल डेस्क के इन्चार्ज बने और फिर वीओआई चले गए। मेरा उनसे कोई संपर्क नहीं रहा, लेकिन फिर उनके बारे में जानने की इच्छा जरूर रही..पूछता रहा उन्हे जानने वालों से..आज वो हमारे बीच नहीं है। वीओआई में उनकी जगह किसी और को नियुक्त कर लिया जाएगा, लेकिन उनकी गूंजती आवाज, खुबसूरत काया और बात करने का उनका जुदा अंदाज .. हमेशा उनकी याद दिलता रहेगा। भले हीं वो इस दुनिया में ना हो, लेकिन वो हमेशा हमारे दिल में रहेंगे..एक आदर्श सीनियर की तरह...बुलंद आवाज के स्वामी की तरह और मीडिया की रणभूमि के एक सच्चे सिपाही की तरह...। ...एक मीडिया कंपनी की गैर जिम्मेदाराना कार्यशैली... ने हमारे एक अनमोल सितारे को हमसे छिन लिया। अशोक उपाध्याय को मेरे..मेरे साथियों और ज़ी 24 घंटे की ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि....