रक्तरंजित दंतेवाड़ा और हत्यारे नक्सलीं
एक साल से भी कम वक्त मे नक्सली ने एक बड़ी वारदात को अंजाम देते हुए 76 जवान को मौंत के घाट उतार दिया. 6 अप्रेल 2010 छत्तीसगढ़ के इतिहास की सबसे रक्तरंजित सुबह बनकर आयी जब पूरी दुनिया ने नक्सलवाद का सबसे क्रूरतम और घिनौना चेहरा देखा, और 76 परिवारों मे किसी ने भाई, तो किसी ने पिता तो किसी ने अपना पति को खो दिया. ये पहला मौका नही जब नक्सलियों ने सुरक्षाकर्मियों को अपना निशाना ना बनाया हो इससे पहले भी उन्होने सुरक्षाकर्मियों के साथ साथ आम नागरिकों को भी मौत के घाट उतारा है लेकिन एक साथ इतने जवानों का नरसंहार उन्होने पहली बार किया है .हालांकि नकस्लियों के लिए नरसंहार कोई नयी बात नही है.भारत मे दुर्घटनाये घटती है तीन चार दिन तक लोग आहत दिखते है सरकारे औपचारिकताएं पूरी करती है और जिंदगी फिर उसी ढर्रे पर चलने लगती हैं. लेकिन एक सवाल जिसका जवाब आज तक नही मिल पाया है कि आखिर कब तक सुरक्षाकर्मी या सामान्य नागरिक नक्सली हिंसा के शिकार होते रहेंगे. सीधी सी बात है जिसका खोता है वही ढूंढ़ता है और जिन 76 लोगो को नक्सलियों ने निशाना बनाया है उसका दर्द भी इन 76 परिवारों को ही होगा. दंतेवाड़ा के ताड़मेटला का जंगल जहां पर ये घटना घटी वह नक्सलियों का गढ़ कहा जाता है जहां सरकार अपनी पकड़ बनाने के लिए प्रयास कर रही हैं.4 अप्रेल 2010 से सीआरपीएफ की 62 वी बटालियन की एक कंपनी ग्रीन हंट अभियान के तहत सर्चिंग मे लगी थी.इस कंपनी मे कुल 82 जवान और आफिसर शामिल थे.अभियान में लगे जवान दिन भर सर्चिंग के बाद चिंतलनार थाने में कैंप करते थे. घटना की रात जवान वही सो रहे थे.नक्सलियों ने जवानों की गतिविधियों को ध्यान में रखकर सोची समझी साजिश के तहत एम्बुस लगाया.इससे पूरी कंपनी उनके घेरे में फस गई और देखते ही देखते ही 76 जवान मौंत के गाल मे समा गये.हमला करने वाले नक्सलियों की संख्या 1000 से ज्यादा थी और आप समझ सकते है कि 82 जवान किस तरह हजार नक्सलियों का सामना कर पाते. लेकिन कब तक नक्सली अपने रणनीति मे सफल होते रहेंगे और कब इस देश से नक्सलियों का खात्मा होगा. जब श्रीलंका से एलटीटीई का खात्मा हो सकता है पंजाब से आतंकवाद का खात्मा हो सकता है तो भारत से नक्सली और नक्सली विचारधारा को क्यो नही खत्म किया जा सकता है. कुछ लोग यह तर्क देते है कि हिंसा के रास्ते नक्सली समस्या का समाधान नही हो सकता है लेकिन एलटीटीई या पंजाब से आतंकवाद का समाप्ति भी तो सैन्य तरीके से ही तो हुई .क्योकि मानवता के हत्यारे ये नक्सली कानून या संविधान की भाषा नही समझ सकते है . अब समय आ गया है कि किसी भी मानवाधिकार की कोई बिना परवाह करते हुए इस नक्सलियों से कठोरतम तरीके से निपटा जाए. देश मे इस समय नक्सलियों के खिलाफ वातावरण है और सरकार को चाहिए कि इस वातावरण का उपयोग कर नक्सलियों को उड़ीसा,आंध्रप्रदेश,छत्तीसगढ़,महाराष्ट्र,झारखंड,बिहार से समाप्त कर दे .क्योकि कब तक हम नक्सली समस्या और हिंसा को टालते रहेंगे और कब तक देश के जवान और भोली भाली जनता नक्सली हिंसा का शिकार बनते रहेंगे. इसमे कोई शक नही है कि नक्सली हिंसा हमारी 60 सालों की राजनीतिक और प्रशासनिक असफलता का नतीजा है .सरकारी तंत्र में फैला भ्रष्टाचार, कुछ मुट्ठीभर लोगो मे देश की संपदा का बड़ा हिस्सा होने से निरक्षर और युवकों मे निराशा का वातावरण है और इसे दूर करने के लिए पुख्ता प्रयास करने की आवश्यकता है लेकिन इस तर्क के आड़ मे नक्सलियों से कोई हमदर्दी नही दिखानी चाहिए क्योकि जिस राह पर नक्सली चल रहे है और जो उनका लक्ष्य है वह देश की एकता और अखंडता के लिए घातक सिद्ध हो रहे है. पहले ही सरकार ने इस मामले मे उदासीनता का परिचय दिया है लेकिन ईमानदारी और पारदर्शिता से अगर सारी कल्याणकारी योजनाओं को धरातल पर उतारा जाए तो भोले भाले आदिवासी नक्सलियों के बहकावे मे नही आएंगे. सुरक्षा तंत्र,स्थानीय तंत्र,खुफिया तंत्र मे समन्वय की जोरदार आवश्यकता है जिसके आधार पर नक्सलियों को मुहतोड़ जवाब दिया जा सकता है... ताकि फिर कोई निर्दोष या निहत्थे नक्सलियों के निशाने पर ना आये पाये.बिना किसी रहमदिली के नक्सलियों के खात्मे का वक्त आ गया है....और हम उम्मीद करते है कि जिस तरह भारत ने दूसरे अन्य संकट पर विजय पायी है उसी तरह नक्सली हिंसा पर भी विजय मिलेगी.. एक बात और अगर किसी भी स्तर पर तथाकथित बौद्धिक वर्ग के लोग नक्सलियों का समर्थन करते है तो ऐसी आवाज और ऐसे समर्थन के खिलाफ भी कठोरतम कार्यवाई की जानी चाहिए क्योंकि इन मावनाधिकारवादियों ने नक्सली हिंसा के शिकार जवानों के परिवारों की पीड़ा जानने की कोई कोशिश कभी नही की है.
बुधवार, 7 अप्रैल 2010
रविवार, 14 फ़रवरी 2010
...अब पूरी दुनिया को बना दो निकम्मा !

क्रिकेट ने तो अभी तक सिर्फ एशियाई मुल्क को ही निकम्मा बनाया था, लेकिन अब लगता है पूरी दुनिया ही निकम्मी हो जाएगी। क्रिकेट के पीछे अभी तक तो सिर्फ हम..हमारा पड़ोसी पाकिस्तान...बांग्लादेश और श्रीलंका ही भागा करते थे..लेकिन अब चीन..अमेरिका..जर्मनी और जापान की टीमें भी क्रिकेट के चौके-छक्के के पीछे भागते हुए दिखाई देगी। वर्ल्ड कप...चैंपियंस ट्रॉफी जैसे बड़े आयोजन के बाद जब आईपीएल का क्रिकेट का नया अवतार हुआ तो क्रिकेट का साख भी बढ़ी और लोकप्रियता भी...लेकिन साथ ही सवाल भी उठा कि क्या क्रिकेट की आड़ में दूसरे खेल तबाह तो नहीं हो रहे ...। जवाब मिला हो या नहीं ... ये तो पता नहीं... लेकिन अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक काउंसिल ने जब से क्रिकेट को ग्रीन स्गिनल दिखाई है..तब से ये बहस जिंदा जरूर हो गई है । ओलंपिक की अहमियत इसलिए अभी तक सबसे ज्यादा है क्योंकि ... स्टेमिना .. कुशलता और धैर्य का इसी आयोजन (ओलंपिक) में सबसे बड़ा इम्तिहान होता है... इस आयोजन में कई ऐसी स्पर्धा शामिल होती है...जो विश्व में या तो लोकप्रिय नहीं है ... या फिर काफी पिछड़ी है।
क्रिकेट फिलहाल सबसे लोकप्रिय खेल है...और जाहिर है अगर ओलंपिक में इसकी इंट्री होगी तो वो इंटरटेन करने के मामले में बाकि सारे खेलों को दबा देगा। अभी तक ओलंपिक में सिर्फ 26 खेल में 30 वर्ग के 300 स्पर्धाएं ही आयोजित होती थी... लेकिन 2016 में रियो डि जेनारियो में होने वाले ओलंपिक में दो खेल और बढ़ जाएंगे...क्योंकि इस ओलंपिक के लिए आयोजन समिति में गोल्फ और रग्बी को मंजूरी दे दी है। लेकिन 2020 ओलंपिक में खेलों की संख्या और भी बढ़ जाएगी...क्योंकि आयोजन समिति ने इस वर्ष के ओलंपिक में क्रिकेट के साथ-साथ क्लाइम्बिंग के साथ-साथ पावर बोटिंग को भी शामिल कर लिया है। सवाल ना रग्बी.. ना गोल्फ.. ना पावर बोटिंग और ना तो क्लाइम्बिंग को ओलंपिक में शामिल करने पर है.. सवाल है तो क्रिकेट पर ...सवाल नहीं डर है..... डर इस बात का.... कि कहीं क्रिकेट का बुखार पूरी दुनिया को ही अपनी चपेट में ना ले ले..... क्रिकेट में मैडल जीतने के चक्कर में अमेरिका.. रुस..और जर्मनी जैसी विश्व की टॉप मेडलिस्ट टीम दूसरे खेल से अपना ध्यान भटकाकर सिर्फ क्रिकेट के पीछे ही ना भागने लगे। ऐसे देखा जाए तो क्रिकेट को ओलंपिक में शामिल करना हमारे लिए ख़ुशख़बरी ही है...क्योंकि अगर ओलंपिक में क्रिकेट को शामिल किया गया तो भारत की टीम ही गोल्ड मैडल की प्रबल दावेदार होगी। साफ है कि क्रिकेटरों के लिए और एशियाई देश के लिए भले ही ओलंपिक समिति का फैसला एक ख़ुशख़बरी हो....लेकिन बाकी खेलों के लिए ये अच्छी ख़बर बिल्कुल भी नहीं हैं।
शनिवार, 13 फ़रवरी 2010
ख़ुशख़बरी ! प्रेमी-प्रेमिकाओं के लिए ख़ुशख़बरी

ख़ुशख़बरी ! …. ख़ुशख़बरी ! ….ख़ुशख़बरी ! ….प्रेमी-प्रेमिकाओं के लिए ख़ुशख़बरी ! ….इस बार वेलेंटाइन डे पर उन्हें कोई नहीं रोकेगा.... कोई उन्हें गार्डन में एक-दूसरे से मिलने पर नहीं टोकेगा...कोई उन्हें एक-दूसरे को फूल देने पर नहीं पिटेगा....रेस्टोरेंट में साथ खाना खाने पर नहीं पकड़ेगा और ना ही पब में साथ डांस करने पर जबरदस्ती शादी करा देगा....क्योंकि सेना (शिवसेना) इस बार दूसरे कामों में व्यस्त है ...जी हां वही किंग ख़ान की फिल्म माई नेम इज़ खान के ख़िलाफ़ धमा-चौकड़ी मचाने में....बहुत दिन से सुन रहा हूं....शिवसेना ने वहां पोस्टर जला दिया.. उसका बैनर फाड़ दिया...वहां उत्पात मचा दिया। सुनकर बूरा भी लगा और अच्छा भी.... !!! बूरा इसलिए कि, देखो अपने देश में क्या कुछ हो रहा है... और अच्छा इसलिए कि.... चलो ठीक है … इसी बहाने सेना को कुछ काम तो मिला...!!!!! पिछले कुछ सालों से ठाकरे की ये सेना तो बिल्कुल निकम्मी ही हो गई थी...ना तो हथियार में धार बचे थे... और ना ही जुबान पर आक्रमकता ....अच्छा हुआ..!!!!! कुछ दिनों के लिए ही सही....इन कागजी शेरों को दहाड़ने का (नारेबाज़ी) का मौका तो मिला। नहीं तो, पूरे साल में ये, सिर्फ एक ही दिन तो काम करते हैं...और वो भी 14 फरवरी यानि वेलेंटाइन डे को....इधर-उधर गार्डंस में घूमकर प्रेमी-प्रेमिकाओं को पकड़ना...रेस्टोरेंट जाकर सुकून से बैठे प्रेमी जोड़ों को मारना-पिटना...जबरदस्ती शादी कराना ... यही तो इनका काम बचा था। वो तो शुक्र हो, शाहरुख़ खान और IPL का...जिन्होंने ठाकरे के सैनिकों को 14 फरवरी के पहले दूसरे काम में फंसा दिया और इन्हे उनके मेन मोटो ( वेलेंटाइन डे ) के पहले ही थका दिया।... सोचिए !!!! अगर शाहरुख ने आईपीएल को लेकर बयान नहीं दिया होता...तो क्या होता ???? वही होता, जो हर साल होता है, यानि सिर्फ एक दिन और वो भी तीन-चार घंटे के लिए सेना बाहर निकलती....दो-तीन घंटे तक हाथ में भगवा झंडा लेकर इधर-उधर धमा-चौकड़ी मचाती ... वेलेंटाइन डे हाय-हाय के नारे लगाती... प्रेमी-प्रेमिकाओं को पकड़ती...मारती-पिटती और जबरदस्ती शादी कराती। चलो, इस बार कम से कम प्रेमी-प्रेमिका सुकून प्रेम का इजहार तो कर सकेंगे। अब पता नहीं ये प्रेमी-प्रेमिका किसका थैक्स करें ? बाल ठाकरे का (जिन्होंने शाहरुख के खिलाफ अपनी सेना को लगाकर उन्हें वेलेंटाइन के पहले थका दिया) या फिर शाहरुख खान का (जिन्होंने आईपीएल में पाकिस्तानी प्रेम का इज़हार किया) ! खैर जो भी हो हम तो बस यही कहेंगे... good luck $ Cherr!!!!!! Up
सोमवार, 8 फ़रवरी 2010
मुंबई बाल ठाकरे की बपौती है क्या ?

सब जानते हैं कि बाल ठाकरे जो कर रहे हैं वो ग़लत है...सबको पता है कि बाल ठाकरे का बयान संविधान के खिलाफ़ है..तोड़फोड़..भड़काऊ बयान...और सरेआम गुंडागर्दी आपसी सौहार्द को बिगाड़ रही है... लेकिन फिर भी सरकार क्यों बार-बार ठाकरे परिवार के सामने सरेंडर कर रही है समझ में नहीं आ रहा...? क्यों बार-बार हम गिड़गिड़ा रहे हैं और वो हमें ठेंगा दिखा रहे हैं। क्या हमारी सरकार पूरी तरह से नपूंसक हो गई है ? क्यों ठाकरे परिवार के गिरेबान तक पहुंचने से पहले कानून के हाथ कांपने लगते हैं। कानून में कमी है या फिर केंद्र-महाराष्ट्र सरकार की इच्छाशक्ति में । क्यों नहीं बाल ठाकरे और राज ठाकरे जैसे नेता सलाखों के पीछे दिख रहे हैं। अभी कल की ही बात है कि शरद पवार बाल ठाकरे के निवास स्थान मातोश्री पहुंचे और उनसे अपना गुस्सा शांत रखने का अनुरोध किया। ठाकरे के सामने हमारे केंद्रीय मंत्री शरद पवार ने गिड़गिड़ाया....कहा कि आप ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को मुंबई में खेलने दें..... और बाल ठाकरे ने मालिक की तरह, कहा... ठीक है देख लेंगे। ऐसा लगा मानों मुंबई देश की नहीं बाल ठाकरे की बपौती हो । ना तो बाल ठाकरे के पास गिड़गिड़ाने में शरद पवार को शर्म आई...और ना ही बाल ठाकरे को कुछ बोलते हुए लाज आई...ऐसा लगा मानों मुंबई में देश का संविधान नहीं.. बाल ठाकरे का संविधान चलता हो। मतलब बाल ठाकरे ने जो कह दिया.. वही सही है..बाकि सब ग़लत। कुछ दिन पहले तक ठाकरे पाकिस्तानी खिलाड़ियों के पीछे पड़े थे और अब ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों के पीछे पड़े हैं। ठाकरे कहते हैं कि ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हमला हो रहा है तो फिर हम उस देश के खिलाड़ी को, कैसे अपने देश में खेलने दें। ठाकरे जिस तरह का बयान दे रहे हैं...उसे देखकर तो यही लगता है मानों पूरी दुनिया-जहान का उन्होंने ही ठेका ले रखा है। कौन कहां खेलेगा...कौन किसे अपनी टीम में लेगा....और कौन किसके ख़िलाफ़ क्या बोलेगा.. सब ठाकरे के ही हुक्म से बोलेगा और चलेगा। ना तो बाल ठाकरे को अपनी उम्र का लिहाज है और ना ही देश की अखंडता का अहसास...कितनी शर्म की बात है कि देश का केंद्रीय मंत्री आज एक अदने से नेता..जिसकी खुद की ना तो कोई औकात है..और राष्ट्रीय राजनीति में कोई पकड़ ... उसके पास जाकर हाथ फैला रहा है.... अनुरोध कर रहा है... कह रहा है भाई... हम पर रहम करो ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ियों को मुंबई में खेलने दो। शरद पवार साहब आपकी सत्ता है...आपके पास ताकत है..केंद्र में आपकी सरकार है और महाराष्ट्र में भी आपका ही हुक्म चलता है, तो फिर क्या जरूरत पड़ गई जो बाल ठाकरे जैसे नेता के पास गिड़गिड़ाने की....उत्पाती शिवसैनिक को पकड़िए...जमकर धुनिए और जेल में डालिए...देखिए फिर कैसे इन शिवसैनिकों की सिट्टी-पिट्टी गुम होती है। एक दिन चिल्लाएंगे-दो दिन चिल्लाएंगे ... तीसरे दिन कोई शिवसैनिक घर से नहीं निकलेगा.... पवार साहब.! कानून हमारे देश का बहुत बड़ा है और डंडे में बहुत ताकत है....हां, बस इस्तेमाल करना आना चाहिए। हमें पता है जो हम बोल रहे हैं ...उससे ना तो बाल ठाकरे को कोई फर्क पड़ेगा और ना ही शरद पवार को। क्योंकि सब राजनीति है...और राजनीति के आगे बड़े से बड़ा नेता भी नामर्द बन जाता है।
सोमवार, 1 फ़रवरी 2010
आखिर सिंगल में कब मिलेगा ग्रैंड स्लेम ?

रविवार दोपहर से ही लिएंडर पेस मीडिया की सुर्खियों में थे। करीब एक घंटे तक ब्रेकिंग न्यूज चलने के बाद..स्पेशल स्टोरी और आधे घंटे तक का स्पेशल प्रोगाम चलाने का जो दौर शुरू हुआ, जो देर रात ही नहीं, सोमवार दोपहर तक जारी रहा। वजह ऑस्ट्रेलियन ओपन में पेस का मिक्सड डबल्स का खिताब जीतना । बेशक लिएंडर पेस ने जो किया वो देश के लिए गौरव की बात है, हम भी उनके कायल हैं और उनके प्रदर्शन का लोहा मानते हैं, उनकी कामयाबी को देख हमारा सीना भी चौड़ा हो जाता है। लेकिन आपको लगता नहीं ....? कि सवा अरब जनसंख्या वाले देश में सिर्फ एक ग्रैंड स्लेम और वो भी सिंगल में नहीं मिक्सड डबल्स में... महज एक सांत्वना सरीखा ही है। देश में ऐसे कहने को तो, कई दमदार युवा खिलाड़ी हैं.. और शानदार अनुभवी खिलाड़ी भी.... तो फिर उन खिलाड़ियों में एक भी सिंगल ग्रैंड स्लेम जीतने का माद्दा क्यों नहीं है ? आखिर ग्रैंड स्लेम के सिंगल मुकाबले में उनका दम क्यों नहीं दिखता....क्यों हमारी कामयाबी सिर्फ डबल्स और मिक्सड डबल्स तक ही सिमटी रह जाती है ? क्यों नहीं हम सिंगल में क्वार्टर फाइनल तक भी पहुंच पाते ? कहते हैं आप आदर्श बनिए! दुनिया आपके पदचिन्हों पर चलने के लिए तैयार है। आज टेनिस की दुनिया में रोजर फेडरर, जस्टिन हेनिन जैसे आदर्श मौजूद हैं, तो फिर हमारे खिलाड़ी, उन आदर्श के पदचिन्हों पर क्यों नहीं चलते ? क्यों नहीं हमारे देश में भी फेडरर .. नाडाल....एंडी मर्रे और डोकोविच जैसे खिलाड़ी पैदा होते हैं ? क्यों सवा अरब लोगों की जनसंख्या वाले देश में अभी तक एक ऐसा सूरमा पैदा नहीं हुआ ... ? जो सीना ठोककर ये कह सके कि मैं जीतूंगा देश के लिए सिंगल में ग्रैंड स्लेम! आखिर कब तक हमारा देश सिर्फ लिएंडर पेस और महेश भूपति की ही कामयाबी पर गर्व करता रहेगा.. क्या हमारी निगाहों को नया लिएंडर पेस...अलग महेश भूपति और दूसरी सानिया मिर्जा के दीदार के लिए अभी और इंतजार करना होगा। 11वां ग्रैंड स्लेम जीतकर महेश भूपति की बराबरी करने वाले लिएंडर पेस ने कहा कि वो फेडरर के नक्शे कदम पर चलना चाहते हैं..लेकिन मेरा सवाल लिएंडर से ये है कि सिर्फ वो नक्शे कदम पर चलना चाहते हैं या फिर चलेंगे भी...क्या हम सिर्फ क्रिकेट में ही नंबर वन बनेंगे, क्या हमारे देश का कोई खिलाड़ी कभी दुनिया का नंबर एक खिलाड़ी नहीं बनेगा। क्या हमारे देश के खेलप्रेमी सिर्फ फेडरर और नाडाल की जीत पर ही ताली बजाते रह जाएंगे....या फिर हम अपने देश के खिलाड़ी पर कभी इतराएंगे ?
रविवार, 31 जनवरी 2010
हंगामा इसलिए है बरपा...

इस बार क्रिकेट के बाजार में पाकिस्तानी माल नहीं बिका। माल चोखा भी था और ताजा भी...ऐसे में उम्मीद तो यही थी कि ये माल सभी को लुभाएगा..और लुभाएगा ही क्यों ? सबसे ज्यादा दाम में भी बिकेगा, लेकिन वक्त का सितम देखिए...जिसकी कीमत सबसे ज्यादा लगनी चाहिए थी..उसे खरीदने की बात तो दूर मोलभाव भी करने वाला कोई खड़ा नहीं हुआ.. नतीजा पाक का ताजा माल आईपीएल पार्ट थ्री के लिए बासी हो गया। ऐसा नहीं था कि सिर्फ पाकिस्तानी माल ही आईपीएल की मंडी में पड़ा रहा..बल्कि क्रिकेट की मंडी में पहुंचे दुनिया भर के सौ से ज्यादा खिलाड़ी इस बार बिक नहीं सके...लेकिन नहीं बिकने वालों में सबसे ज्यादा बवेला मचाया पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने.. किसी ने कहा उनका अपमान हुआ.. तो किसी ने कहा धोखा .. किसी ने मोदी को कोसा.. तो किसी ने विदेश मंत्रालय को जिम्मेदार बताया। पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने आईपीएल में खेलने को लेकर भारत के खेल बिरादरी से लेकर सियासी गलियारे तक हल्ला मचाया, उसे देखकर तो यही लगा कि ये पाकिस्तानी खिलाड़ियों का क्रिकेट प्रेम है, लेकिन वास्तविकता में ये क्रिकेट प्रेम नहीं .. पैसा प्रेम है। दरअसल पाकिस्तानी खिलाड़ियों को आईपीएल में खरीदा जाता तो उन्हे इतना पैसा मिल जाता जितना कई सालों तक अपने देश की तरफ खेलने के बाद भी नहीं मिल पाता। पीसीबी अपने क्रिकेटरों को तीन ग्रेडों में बांटकर पगार देता है। ‘ A ’ ग्रेड के खिलाड़ियों को प्रति माह ढाई लाख रुपए..‘ B ’ ग्रेड के खिलाड़ियों को एक लाख 75 हजार रुपये और ‘ C’ ग्रेड में शामिल पाकिस्तानी खिलाड़ियों को एक लाख 25 हजार रुपये मिलता है। यानि कोई पाकिस्तानी खिलाड़ी ग्रेड A में भी हो तो साल भर में वो 30 लाख से ज्यादा कमा नहीं पाता होगा, लेकिन अगर उन्हे आईपीएल में खेलने का मौका मिलता है तो डेढ़ महीने में ही उनकी कमाई साढ़े तीन करोड़ रुपये तक हो जाती। तो समझे ना !!! पाकिस्तानी खिलाड़ियों के लिए हंगामा यूं ही नहीं बरपाया..हंगामा इसलिए हैं बरपाया..!!!
रविवार, 3 जनवरी 2010
BCCI : चोरी भी, सिनाजोरी भी !


बचपन से सुनता आया हूं... ग़लतियों को कभी मत छुपाओ...बुराई को कभी बढ़ावा मत दो...अगर तुम वास्तव में किसी के शुभचिंतक हो तो फिर उसके सबसे बड़े आलोचक बनो....घर में मम्मी-पापा से सुना ...स्कूल में शिक्षक ने बताया...लेकिन भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के जितने भी अधिकारी हैं..वो लगता है ऐसे बुनियादी शिक्षा से महरुम है...ऐसे तो कई बार बीसीसीआई की दिमागी संतुलन पर सवाल उठे हैं...लेकिन इस बार जो नया वाकया कोटला विवाद पर बयान के रूप में सामने आया है, उससे तो ये बात पूरी तरह साबित हो गई ...कि सच में बीसीसीआई का उपरी तल्ला खाली हो चुका है। 27 दिसंबर 2009 को कोटला पर कैसा कोहराम हुआ, ये हमने भी देखा और आपने भी देखा होगा...कोटला की पिच किस कदर खराब थी ये बताने की जरूरत नहीं... पूरी दुनिया ने देखा कि 23 ओवर के खेल में किस तरह गेंद ज़मीन चूमकर हवा लहराई.. कितनी बार गेंद जयसूर्या के सर से पार गई... किस तरह सुदीप की गेंद पर दिलशान बल्ला छोड़ औंधे मुंह गिर पड़े... किस तरह गेंद की मार से जयसूर्या तिलमिला गए...लेकिन लग रहा है जब ये सारा वाकया हो रहा था तो बीसीसीआई के अधिकारियों के घरों से बिजली गायब थी...तभी तो जो कुछ घटा वो बीसीसीआई ने नहीं देखा.... या यूं कहें कि जब कोटला पर मैच चल रहा था...उस वक्त बीसीसीआई के अधिकारी आंख-मिचौली खेल रहे थे...और किसी एक की आंख पर नहीं बीसीसीआई के सारे अधिकारी की आंख पर पट्टी बांध दी गई थी... खराब पिच जो कुछ होना था वो तो हो गया...नियम के मुताबिक बीसीसीआई से आईसीसी ने जवाब तलब किया ....कि किस परिस्थिति में नई नवेली पिच पर अंतरराष्ट्रीय मैच करा दिए गए...क्यों मुकाबले के पहले पिच को जांचा परखा नहीं गया........पता है ? इस सारे का सवाल का जो जवाब Bcci ने तैयार किया वो क्या है । बीसीसीआई ने कहा है पिच बिल्कुल भी खराब नहीं थी....अगर खराब होती तो क्या 23 ओवर के खेल में सिर्फ सात बार ही गेंदें खतरनाक तरीके से उठती ? मतलब अपना जवाब नहीं देकर बीसीसीआई ने खुद आईसीसी से ही सवाल पूछ डाले। साफ है कि बीसीसीआई तभी पिच को खतरनाक मानता जब 23 ओवर के खेल में करीब 100 से ज्यादा गेंदें खतरनाक तरीके से उठती और उस गेंद से एक- दो नहीं, लंका के सभी खिलाड़ी घायल हो जाते। चोरी और सिनाजोरी तो देखिए ! बीसीसीआई ने यहां तक कहा डाला है कि जब उनकी टीम न्यूज़ीलैंड में खतरनाक पिच पर खेली थी, तो उस वक्त आईसीसी क्यों खामोश रहा। अरे भाई साहब ! अपनी गलतियां देखिए ना.... दूसरों की ग़लतियों को क्यों गिना रहे हैं। बीसीसीआई ने कोटला की पिच के बारे में जितनी भी दलील दी है मेरे-आपके क्या पूरी दुनिया के पल्ले से बाहर है.। डीडीसीए को बचाने और खुद की ग़लतियों को छुपाने के लिए बीसीसीआई जो कुछ दलील दे रही है ...मैं तो उससे इक्तेफाक नहीं रखता...क्या आप इक्तेफाक रखते हैं। हमें जरूर बताइएगा...नहीं तो बीसीसीआई की तरह ग़लतियों को बढ़ावा देने वालों में शामिल हो जाएंगे।
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